Char Dham Yatra :- उत्तराखंड की पवित्र वादियों से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने आस्था, परंपरा और अधिकारों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। बद्रीनाथ, केदारनाथ और गंगोत्री धाम से जुड़ा यह विषय केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं से जुड़ा मुद्दा बन चुका है। पहाड़ों में बसे ये धाम सिर्फ मंदिर नहीं, बल्कि विश्वास, तपस्या और सदियों पुरानी परंपराओं के जीवंत प्रतीक माने जाते हैं। ऐसे में मंदिर समितियों की ओर से गैर हिंदुओं के प्रवेश को लेकर लिए जा रहे फैसलों ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है।
नंदा देवी राजजात पर सस्पेंस बरकरार, 2027 का ऐलान और 2026 की तैयारी ने बढ़ाई हलचल !
बद्रीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति ने इस विषय पर साधु संतों, तीर्थ पुरोहितों और स्थानीय लोगों के साथ सहमति बनने की बात कही है। समिति के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी के अनुसार, जल्द होने वाली बोर्ड बैठक में इस प्रस्ताव पर औपचारिक मुहर लग सकती है, जिसके बाद बद्रीनाथ और केदारनाथ धामों में यह नियम लागू हो जाएगा। उनका कहना है कि ये स्थल पर्यटन के केंद्र नहीं, बल्कि वैदिक आस्था के प्रमुख स्थान हैं, जिनकी स्थापना आदि शंकराचार्य से जुड़ी मानी जाती है। समिति का तर्क है कि संविधान का अनुच्छेद 26 धार्मिक संस्थाओं को अपने धार्मिक मामलों के प्रबंधन का अधिकार देता है।

गंगोत्री मंदिर समिति ने तो इस मामले में साफ घोषणा कर दी है कि मां गंगा के मंदिर में गैर हिंदुओं का प्रवेश वर्जित रहेगा। समिति के सचिव सुरेश सेमवाल ने दोहराया कि यह व्यवस्था पहले से चली आ रही परंपराओं के अनुरूप है और धाम की धार्मिक मर्यादा बनाए रखने के लिए इसे सख्ती से लागू किया जाएगा। गंगोत्री को पूरी तरह आस्था का क्षेत्र बताते हुए इसे किसी सामान्य सार्वजनिक स्थल की तरह न देखने की अपील भी की गई है।
हालांकि चारधामों में शामिल यमुनोत्री मंदिर समिति ने अभी इस मुद्दे पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि चारों धामों में स्थिति एक जैसी नहीं है और अलग-अलग समितियां अपने स्तर पर विचार कर रही हैं।
23 अप्रैल सुबह 6:15 बजे खुलेंगे बद्रीनाथ के कपाट, देखें बाकी धामों की तारीखें !
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस पूरे विषय पर संतुलित रुख अपनाते हुए कहा है कि चारधाम यात्रा के प्रबंधन में मुख्य भूमिका मंदिर समितियों की है, जबकि सरकार सहयोगी की भूमिका निभाती है। उन्होंने यह भी कहा कि इस विषय पर सभी हितधारकों की बात सुनी जाएगी। इससे संकेत मिलता है कि मामला संवेदनशील है और सरकार इसे केवल प्रशासनिक आदेश के रूप में नहीं देख रही।
दूसरी ओर, कांग्रेस ने इस मुद्दे को राजनीतिक नजरिये से देखा है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का कहना है कि सरकार जनसमस्याओं से ध्यान हटाने के लिए ऐसे मुद्दों को उभार रही है। उनके अनुसार, बार बार इस तरह की घोषणाएं लोगों को उलझाने का काम करती हैं। इस बयान के बाद यह मामला केवल धार्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक बहस का भी हिस्सा बन गया है।
मंदिर समिति की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया है कि सनातन धर्म में विश्वास रखने वाले श्रद्धालुओं का स्वागत है, और यह निर्णय किसी धर्म विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि मंदिर की आस्था और परंपराओं से जुड़ा है। लंबे समय से बद्रीनाथ और केदारनाथ आने वाले सिख और जैन श्रद्धालुओं का उदाहरण देते हुए कहा गया कि असली सवाल व्यक्ति की श्रद्धा का है, न कि उसकी पहचान का।
नफरती भाषण देने के मामले में 71भाषणों के साथ पहले स्थान पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी !
हरिद्वार में गंगा सभा द्वारा भी हर की पौड़ी और आसपास के घाटों को लेकर गैर हिंदू प्रवेश पर प्रतिबंध की मांग ने इस चर्चा को और व्यापक बना दिया है। वहां ‘अहिंदू निषेध क्षेत्र’ के बोर्ड लगाए जाने की खबर ने इस विषय को और संवेदनशील बना दिया है। यह पूरा घटनाक्रम एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां आस्था, परंपरा, कानून और राजनीति सब एक साथ जुड़ते दिख रहे हैं। करोड़ों लोगों के लिए चारधाम केवल यात्रा नहीं, बल्कि जीवन का आध्यात्मिक सहारा हैं। ऐसे में लिया गया हर फैसला भावनाओं को गहराई से प्रभावित करता है।
Disclaimer :- यह लेख उपलब्ध जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य किसी धर्म, समुदाय या व्यक्ति की भावनाओं को आहत करना नहीं, बल्कि विषय को संतुलित रूप में प्रस्तुत करना है। किसी भी आधिकारिक निर्णय के लिए संबंधित मंदिर समितियों या सरकारी घोषणाओं को ही अंतिम मानें।




