Agastya Rishi Doli :- उत्तराखंड की हवाओं में आज भी आस्था की सुगंध घुली हुई है। यहां की नदियां, पहाड़ और मैदान केवल प्रकृति नहीं हैं, बल्कि सदियों की तपस्या, विश्वास और देव परंपराओं के साक्षी हैं। लेकिन बदलते समय के साथ जब विकास और निजी स्वार्थ आस्था से टकराने लगें, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। कुछ ऐसा ही दृश्य 14 जनवरी, मकर संक्रांति के पावन अवसर पर रुद्रप्रयाग जिले के अगस्त्यमुनि क्षेत्र में देखने को मिला, जहां एक ऐतिहासिक और भावनात्मक घटना ने सभी को सोचने पर मजबूर कर दिया।
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15 वर्षों बाद निकली अगस्त्य ऋषि मुनि महाराज की देव डोली
लगभग 15 सालों के लंबे इंतजार के बाद अगस्त्यमुनि में अगस्त्य ऋषि मुनि महाराज की चल विग्रह देव डोली क्षेत्र भ्रमण के लिए निकाली गई। जैसे ही डोली मंदिर परिसर से बाहर आई, पूरा इलाका “मुनि महाराज की जय” के जयकारों से गूंज उठा। दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन और आशीर्वाद के लिए उमड़ पड़े। हर चेहरा भक्ति और उत्साह से भरा हुआ था। ऐसा लग रहा था मानो वर्षों पुरानी परंपरा फिर से जीवंत हो उठी हो।
जब देव परंपरा और आधुनिक निर्माण आमने-सामने आ गए
देव डोली जैसे ही अगस्त्य ऋषि सैण की ओर बढ़ी, तभी रास्ते में स्टेडियम के पास बना गेट यात्रा में बाधा बन गया। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देव डोली का इस तरह रुक जाना शुभ संकेत नहीं माना जाता। पुजारी, स्थानीय लोग और श्रद्धालु लंबे समय तक डोली को आगे बढ़ाने का प्रयास करते रहे, लेकिन डोली वहीं स्थिर रही। लोगों के मन में यह भावना गहराने लगी कि शायद अपने तपस्थल की वर्तमान स्थिति से अगस्त्य ऋषि मुनि महाराज अप्रसन्न हैं।
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केदारनाथ हाईवे पर आस्था का जाम
डोली के रुकते ही केदारनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर यातायात पूरी तरह ठप हो गया। देखते ही देखते सड़क के दोनों ओर तीन से चार किलोमीटर लंबा जाम लग गया। यात्री, श्रद्धालु और स्थानीय लोग घंटों तक सड़क पर फंसे रहे। यह जाम केवल वाहनों का नहीं था, बल्कि व्यवस्था, संवेदनशीलता और सोच का भी प्रतीक बन गया। आखिरकार, काफी देर तक प्रयासों के बावजूद जब स्थिति नहीं संभली, तो देव डोली नाराज होकर वापस मंदिर परिसर की ओर लौट गई।

एक घटना, कई सवाल
इस पूरे घटनाक्रम ने स्थानीय प्रशासन और नेताओं की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस मैदान को अगस्त्य ऋषि मुनि महाराज की तप भूमि माना जाता है, वहां अव्यवस्थित निर्माण और निजी हितों का हावी होना लोगों को भीतर तक आहत कर गया। क्या विकास का मतलब आस्था की अनदेखी है। क्या देवभूमि की पहचान धीरे-धीरे केवल नाम तक सीमित रह जाएगी। आज अगस्त्यमुनि में लगा घंटों का जाम शायद केवल ट्रैफिक का नहीं था, बल्कि चेतावनी भी था।
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