Ankita Bhandari Case :- उत्तराखंड की शांत वादियों में एक बेटी के लिए न्याय की आवाज अब भी थमी नहीं है. अंकिता भंडारी का मामला सिर्फ एक अपराध की कहानी नहीं रहा, बल्कि यह पूरे प्रदेश की संवेदनाओं से जुड़ा विषय बन चुका है. लोग इसे पहाड़ की बेटियों की सुरक्षा, सम्मान और अस्मिता से जोड़कर देख रहे हैं.
यही वजह है कि समय बीतने के बावजूद जनभावनाएं शांत नहीं हुईं, बल्कि और मुखर होती जा रही हैं. सीबीआई जांच की संस्तुति के बाद भी लोगों के मन में यह सवाल बना हुआ है कि क्या सच पूरी तरह सामने आएगा और दोषियों को सजा मिलेगी. इसी पृष्ठभूमि में देहरादून में प्रस्तावित महापंचायत को लेकर माहौल एक बार फिर गरमाया हुआ है.
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देहरादून में महापंचायत का ऐलान, जनता से बड़ी भागीदारी की अपील
8 फरवरी को परेड ग्राउंड में ‘वीआईपी कौन? महापंचायत’ आयोजित करने की तैयारी चल रही है. यह आह्वान ‘अंकिता न्याय यात्रा संयुक्त संघर्ष मंच’ की ओर से किया गया है. मंच का कहना है कि यह केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि न्याय के लिए सामूहिक आवाज उठाने का मंच है. इस पहल को उत्तराखंड के लोकप्रिय लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी का भी समर्थन मिला है. नेगी दा ने लोगों से अपील की है कि वे बड़ी संख्या में पहुंचकर लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखें. उनके शब्दों में यह संघर्ष सिर्फ एक परिवार का नहीं, बल्कि पूरे उत्तराखंड की आत्मा की लड़ाई है.
“अगर आज नहीं बोले, तो कल हर बेटी डरेगी”
नरेंद्र सिंह नेगी ने साफ कहा है कि अगर समाज अन्याय के खिलाफ एकजुट होकर आवाज नहीं उठाएगा, तो आने वाले समय में हर परिवार अपनी बेटियों की सुरक्षा को लेकर चिंतित रहेगा. उन्होंने इसे सामाजिक चेतना का क्षण बताते हुए लोगों से संवेदनशील और जिम्मेदार भूमिका निभाने की अपील की है. संघर्ष मंच के सदस्य मोहित डिमरी का कहना है कि जब तक दोषियों को सजा और पीड़ित परिवार को न्याय नहीं मिल जाता, आंदोलन जारी रहेगा. मंच के अनुसार, राज्यभर में जनसंपर्क अभियान चलाए जा रहे हैं ताकि अधिक से अधिक लोग इस महापंचायत में शामिल हों.
राजनीति या न्याय की मांग?
मंच के सदस्यों का आरोप है कि इस मुद्दे को राजनीतिक रंग देने की कोशिश की जा रही है ताकि लोगों के बीच भ्रम फैले. उनका सवाल सीधा है कि अगर कोई नागरिक न्याय की मांग करता है, तो क्या वह राजनीति कहलाएगा? उनके अनुसार, यह जनभावना से जुड़ा मुद्दा है और इसे दबाने के बजाय गंभीरता से सुना जाना चाहिए. इससे पहले 15 जनवरी को शहीद स्मारक में हुई बैठक में भी महापंचायत का निर्णय लिया गया था. उस बैठक में कथित वीआईपी की भूमिका उजागर करने और सभी दोषियों को सख्त सजा दिलाने की मांग दोहराई गई थी.
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उत्तराखंड की अस्मिता से जुड़ा मामला
यह पूरा घटनाक्रम अब केवल कानूनी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है. लोग इसे उत्तराखंड की बेटियों की सुरक्षा, समाज की नैतिक जिम्मेदारी और शासन की जवाबदेही से जोड़कर देख रहे हैं. पहाड़ की संवेदनशील सामाजिक संरचना में इस तरह की घटनाएं गहरा असर छोड़ती हैं, इसलिए न्याय की मांग भावनात्मक रूप ले चुकी है. आने वाली महापंचायत को लेकर अब सबकी नजरें देहरादून पर हैं. यह देखना अहम होगा कि यह जनसमूह किस तरह अपनी आवाज दर्ज कराता है और आगे की दिशा क्या तय होती है.

