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नंदा देवी राजजात यात्रा हुई स्थगित,अब 2027 में होगा हिमालय महाकुंभ, जानिए कारण !

By A S
January 19, 2026 11:36 AM
Nanda Devi Raj Jat Yatra :- नंदा देवी राजजात यात्रा हुई स्थगित,अब 2027 में होगा हिमालय महाकुंभ, जानिए कारण !
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Nanda Devi Raj Jat Yatra :- उत्तराखंड की वादियों में कुछ यात्राएं केवल रास्ता नहीं तय करतीं, वे पीढ़ियों की आस्था को आगे बढ़ाती हैं। नंदा देवी राजजात ऐसी ही एक यात्रा है। जब भी इसका समय आता है, पूरा पहाड़ एक साथ धड़कने लगता है। अब यह तय हो चुका है कि यह ऐतिहासिक यात्रा सितंबर 2026 के बजाय वर्ष 2027 में आयोजित होगी। यह निर्णय नंदा राजजात समिति ने परंपरा, पंचांग और श्रद्धालुओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए लिया है।

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नंदा देवी राजजात 2027 में क्यों

समिति का स्पष्ट कहना है कि नंदा राजजात बारह वर्षों के पारंपरिक चक्र से जुड़ी है और इसे उसी क्रम में संपन्न करना धार्मिक रूप से उचित है। सितंबर माह में उच्च हिमालयी क्षेत्रों में हिमस्खलन और प्राकृतिक आपदाओं का खतरा अधिक रहता है। पहले हुए अनुभवों से सीख लेते हुए यात्रा को आगे बढ़ाया गया है, ताकि श्रद्धालु सुरक्षित रहें और यात्रा की गरिमा बनी रहे।

Nanda Devi Raj Jat Yatra :- नंदा देवी राजजात यात्रा हुई स्थगित,अब 2027 में होगा हिमालय महाकुंभ, जानिए कारण !

यात्रा की शुरुआत और धार्मिक प्रक्रिया

यात्रा से जुड़ी औपचारिक मनौती वसंत पंचमी के दिन की जाएगी। इसके बाद पंचांग की गणना के अनुसार यात्रा की अंतिम तिथियों पर मुहर लगेगी। समिति का उद्देश्य है कि धार्मिक परंपराएं, प्रशासनिक तैयारी और श्रद्धालुओं की सुविधा, तीनों के बीच संतुलन बना रहे।

क्या है नंदा देवी राजजात यात्रा

नंदा राजजात केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है। यह उत्तराखंड की सांस्कृतिक चेतना का जीवंत रूप है। लोक मान्यताओं के अनुसार यह यात्रा मां नंदा देवी को उनके मायके गढ़वाल से ससुराल होमकुंड तक विदा करने का प्रतीक है। मां नंदा देवी को हिमालय की अधिष्ठात्री देवी और शिव-शक्ति परंपरा का केंद्र माना जाता है।

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ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

इतिहासकारों के अनुसार नंदा राजजात का उल्लेख आठवीं और नौवीं शताब्दी से मिलता है। कत्यूरी और गढ़वाल शासकों ने इसे राजकीय संरक्षण दिया। पुराने समय में राजा स्वयं इस यात्रा का नेतृत्व करते थे, इसी कारण इसे राजजात कहा गया। यह यात्रा गढ़वाल और कुमाऊं की साझा सांस्कृतिक आस्था की मजबूत कड़ी भी रही है।

चार सींग वाला भेड़ा और लोक मान्यता

इस यात्रा की सबसे अनोखी पहचान चार सींग वाले दुर्लभ भेड़े, खाडू, से जुड़ी है। मान्यता है कि ऐसे भेड़े का जन्म होते ही राजजात के आयोजन का समय तय माना जाता है। यह भेड़ा यात्रा का अग्रदूत होता है और मां नंदा देवी का प्रतीकात्मक प्रतिनिधि समझा जाता है।

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यात्रा का मार्ग और कठिनाई

नंदा राजजात की शुरुआत चमोली जिले के नौटी गांव से होती है। इसके बाद यात्रा इड़ा बधाणी, कासुंवा, कोटी, नंदकेसरी, थराली और वांण से गुजरते हुए बेदनी बुग्याल पहुंचती है। आगे रूपकुंड, शिलासमुद्र होते हुए अंतिम पड़ाव होमकुंड आता है। लगभग बाइस से पच्चीस दिनों की यह यात्रा करीब दो सौ अस्सी किलोमीटर की दुर्गम पैदल दूरी तय करती है, जहां बर्फ, ऊंचे बुग्याल और बदलता मौसम हर कदम पर परीक्षा लेते हैं।

धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

धार्मिक रूप से यह यात्रा मां नंदा देवी की विदाई और हिमालयी लोकदेवताओं की सामूहिक उपासना का प्रतीक है। सांस्कृतिक रूप से इसमें लोकगीत, जागर, झोड़ा-छपेली, पारंपरिक वेशभूषा और सेवा भाव का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। इसी कारण इसे उत्तराखंड की चलती-फिरती लोकसंस्कृति का संग्रहालय कहा जाता है।

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2027 में संभावित सहभागिता

वर्ष 2014 की राजजात में करीब बीस लाख श्रद्धालु शामिल हुए थे। 2027 में यह संख्या तीस से पचास लाख तक पहुंचने का अनुमान है। देश और विदेश से श्रद्धालु, शोधकर्ता और पर्यटक इस यात्रा में भाग लेते हैं, इसलिए इसे हिमालय का महाकुंभ भी कहा जाता है।

प्रशासनिक तैयारियां और मांगें

समिति ने सरकार से मांग की है कि कुंभ मेले की तर्ज पर नंदा राजजात के लिए अलग प्राधिकरण बनाया जाए। साथ ही सफल आयोजन के लिए लगभग पांच हजार करोड़ रुपये के बजट की जरूरत बताई गई है। सुरक्षा, स्वास्थ्य शिविर, संचार व्यवस्था, आपदा प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण पर विशेष जोर दिया जाएगा। नंदा देवी राजजात 2027 केवल एक आयोजन नहीं होगी, बल्कि वह समय होगा जब पूरा हिमालय फिर से आस्था, परंपरा और सामूहिक चेतना के साथ जीवंत हो उठेगा।

Disclaimer :- यह लेख सार्वजनिक स्रोतों, धार्मिक मान्यताओं और समिति द्वारा घोषित जानकारी पर आधारित है। यात्रा से जुड़ी तिथियां और नियम समय के साथ बदल सकते हैं। यात्रा पर जाने से पहले आधिकारिक सूचनाओं और प्रशासनिक दिशा-निर्देशों की पुष्टि अवश्य करें।

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