Ankita Bhandari Case :- कभी-कभी कोई घटना सिर्फ एक खबर नहीं रहती, वह पूरे समाज के ज़मीर को झकझोर देती है। उत्तराखंड में अंकिता भंडारी हत्याकांड ऐसा ही मामला बन चुका है। समय बीतने के साथ घाव भरने के बजाय और गहरे होते गए हैं। इसी पीड़ा और गुस्से के बीच 11 जनवरी को पूरे उत्तराखंड बंद का ऐलान किया गया है। यह घोषणा उत्तराखंड मूल निवास भू-कानून संघर्ष समिति की ओर से की गई है, जिसके संयोजक मोहित डिमरी ने साफ कहा है कि अब चुप रहने का समय खत्म हो चुका है।
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सरकार को अल्टीमेटम और जांच की मांग
संघर्ष समिति ने सरकार और भारतीय जनता पार्टी को दस दिन का अल्टीमेटम दिया है। मांग साफ है कि इस हत्याकांड में जिस कथित वीआईपी का नाम सामने आता रहा है, उसे जांच के दायरे में लाया जाए और उसका नाम सार्वजनिक किया जाए। साथ ही सरकार से यह भी मांग की गई है कि मामले की जांच जल्द से जल्द केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो यानी सीबीआई को सौंपी जाए। लोगों का कहना है कि जब तक सच्चाई सामने नहीं आती, तब तक न्याय अधूरा है।

सड़कों पर उतरा विपक्ष और सामाजिक संगठन
उत्तराखंड पुलिस द्वारा यह कहे जाने के बावजूद कि इस मामले में किसी वीआईपी की भूमिका नहीं है, विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों ने इस स्पष्टीकरण को मानने से इनकार कर दिया है। देहरादून के परेड ग्राउंड में कांग्रेस, उत्तराखंड क्रांति दल, महिला मंच, वामपंथी दलों और कई सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ता इकट्ठा हुए। मुख्यमंत्री आवास की ओर कूच करते हुए इन लोगों ने एक स्वर में सीबीआई जांच और वीआईपी का नाम उजागर करने की मांग दोहराई।
नारे, तख्तियां और लोगों का गुस्सा
प्रदर्शन के दौरान माहौल बेहद भावुक और आक्रोश से भरा रहा। हाथों में तख्तियां थीं जिन पर अंकिता को न्याय देने की मांग लिखी थी। नारे लगाए जा रहे थे कि अब और देर नहीं की जाएगी और असली दोषियों को सामने लाना ही होगा। यह सिर्फ राजनीतिक विरोध नहीं था, बल्कि आम लोगों की वह आवाज़ थी जो खुद को असहाय महसूस कर रही है।

अदालत का फैसला और उठते नए सवाल
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माले) के राज्य सचिव इंद्रेश मैखुरी ने इस दौरान कई अहम सवाल खड़े किए। उन्होंने याद दिलाया कि कोटद्वार की अपर जिला एवं सत्र न्यायालय ने पिछले साल मई में इस मामले में फैसला सुनाते हुए वनंत्रा रिजॉर्ट के मालिक पुलकित आर्य और उसके दो कर्मचारियों को आजीवन कारावास की सजा दी थी। फैसले में यह भी कहा गया था कि अपराध का मकसद एक वीआईपी को विशेष सेवा न देना था। ऐसे में अब अगर पुलिस यह कह रही है कि कोई वीआईपी था ही नहीं, तो फिर पूरे मामले की बुनियाद ही सवालों के घेरे में आ जाती है।
सीबीआई जांच की मांग क्यों जरूरी मानी जा रही है
प्रदर्शनकारियों का मानना है कि अगर वीआईपी की बात को नकार दिया जाता है, तो इससे न सिर्फ सच्चाई दबेगी बल्कि पहले से दोषी ठहराए गए लोगों के लिए भी कानूनी रास्ते खुल सकते हैं। यही वजह है कि मांग की जा रही है कि इस पूरे मामले की जांच उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश की निगरानी में सीबीआई से कराई जाए, ताकि किसी भी दबाव या प्रभाव से मुक्त होकर सच्चाई सामने आ सके।
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11 जनवरी का बंद एक चेतावनी
11 जनवरी को प्रस्तावित उत्तराखंड बंद सिर्फ एक तारीख नहीं है, बल्कि यह सरकार के लिए एक चेतावनी मानी जा रही है। लोगों का कहना है कि अगर अब भी जवाबदेही तय नहीं हुई, तो यह आंदोलन और तेज होगा। यह बंद उस उम्मीद का प्रतीक है कि शायद इस बार अंकिता को इंसाफ मिल सके और सिस्टम में बैठे लोगों को जनता की आवाज़ सुननी पड़े।




