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उत्तराखंड में नेपाल त्रासदी जैसा खतरा, 64% बढ़ा केदारताल का क्षेत्रफल !

Kedartal Lake GLOF Risk :- उत्तराखंड में नेपाल त्रासदी जैसा खतरा, 64% बढ़ा केदारताल का क्षेत्रफल !

Kedartal Lake GLOF Risk :- हिमालय की ऊंची पहाड़ियों में मौजूद ग्लेशियल झीलें प्रकृति की खूबसूरती का हिस्सा हैं, लेकिन बदलते मौसम और बढ़ते तापमान के बीच यही झीलें चिंता का कारण भी बनती जा रही हैं। उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में स्थित केदारताल झील को लेकर सामने आए एक वैज्ञानिक अध्ययन ने भविष्य में संभावित बाढ़ के जोखिम की ओर ध्यान खींचा है।

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राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान यानी एनआइएच, रुड़की के विज्ञानियों के अध्ययन के मुताबिक पिछले 35 वर्षों में केदारताल झील के क्षेत्रफल में करीब 64 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। झील का आकार बढ़ने का मतलब यह भी है कि अब इसमें पहले की तुलना में काफी अधिक पानी जमा हो सकता है। ऐसे में किसी अप्रत्याशित प्राकृतिक घटना की स्थिति में इसका असर नीचे की घाटियों पर पड़ सकता है।

35 वर्षों में 64 प्रतिशत बढ़ा केदारताल का क्षेत्रफल

केदारताल झील में हुए बदलाव को समझने के लिए एनआइएच रुड़की की वैज्ञानिक टीम ने अलग-अलग वर्षों की सैटेलाइट तस्वीरों और पुराने आंकड़ों का विश्लेषण किया। अध्ययन में पाया गया कि वर्ष 1990 में झील का क्षेत्रफल करीब 64,456 वर्ग मीटर था। वर्ष 2025 तक यह बढ़कर लगभग 1,33,823 वर्ग मीटर हो गया। यानी करीब 35 वर्षों के दौरान झील के क्षेत्रफल में लगभग 64 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। वैज्ञानिकों के मुताबिक झील के क्षेत्रफल में इतनी बड़ी वृद्धि को सामान्य बदलाव के तौर पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसका संबंध आसपास के ग्लेशियरों के पिघलने और क्षेत्र में बदलती जलवायु परिस्थितियों से भी हो सकता है।

प्राकृतिक रुकावट टूटने पर कितनी तेजी से आएगी बाढ़?

अध्ययन की सबसे अहम बात कंप्यूटर आधारित बाढ़ सिमुलेशन से जुड़ी है। विज्ञानियों ने एक ऐसी काल्पनिक स्थिति का मॉडल तैयार किया जिसमें झील के पानी को रोकने वाली प्राकृतिक रुकावट अचानक टूट जाती है। सिमुलेशन में सामने आया कि ऐसी स्थिति में केदारताल से निकलने वाला पानी तेज गति से केदार-गंगा घाटी की ओर बढ़ सकता है। इस काल्पनिक सबसे खराब स्थिति में बाढ़ की लहर करीब 45 मिनट में गंगोत्री क्षेत्र तक पहुंच सकती है। हालांकि पानी के नीचे की ओर बढ़ने के साथ उसकी ताकत कम होने का अनुमान है, लेकिन संकरी पहाड़ी घाटियों में इसका प्रभाव काफी गंभीर हो सकता है।

संकरी घाटियों में कई मीटर बढ़ सकता है जलस्तर

हिमालयी क्षेत्रों की भौगोलिक संरचना अचानक आने वाली बाढ़ के प्रभाव को बढ़ा सकती है। घाटी के संकरे हिस्सों में बड़ी मात्रा में पानी पहुंचने पर जलस्तर कई मीटर तक बढ़ सकता है। नदी के संगम के आसपास और आबादी वाले क्षेत्रों में ऐसी स्थिति और ज्यादा खतरनाक हो सकती है। सड़क, पुल, रास्ते और दूसरी बुनियादी सुविधाएं भी तेज बहाव की चपेट में आ सकती हैं। यही वजह है कि संभावित बाढ़ के रास्ते और संवेदनशील इलाकों की पहचान पहले से करना बेहद जरूरी माना जा रहा है।

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वैज्ञानिकों ने नहीं कहा झील जरूर फटेगी

केदारताल को लेकर सबसे जरूरी बात यह है कि इस अध्ययन को झील फटने की भविष्यवाणी नहीं माना जाना चाहिए। एनआइएच के विज्ञानी डा. लवकुश कुमार पटेल ने स्पष्ट किया है कि अध्ययन का उद्देश्य सबसे खराब संभावित स्थिति को समझना है। यानी वैज्ञानिक यह नहीं कह रहे हैं कि केदारताल झील निश्चित रूप से फटेगी और बाढ़ आएगी। सिमुलेशन का मकसद यह जानना है कि यदि ऐसी घटना होती है तो उसका संभावित प्रभाव कितना बड़ा हो सकता है।

हिमालय में बढ़ते तापमान का सीधा असर ग्लेशियरों पर पड़ रहा है। तापमान बढ़ने के साथ ग्लेशियरों के पिघलने की प्रक्रिया तेज हो सकती है और इससे ग्लेशियल झीलों में पानी की मात्रा बढ़ सकती है। अध्ययन में इस क्षेत्र में तापमान बढ़ने और अत्यधिक वर्षा की घटनाओं में बदलाव की प्रवृत्ति भी देखी गई है। भारी बारिश ऊंचाई पर स्थित झीलों में अचानक पानी बढ़ाने का कारण बन सकती है, जिससे प्राकृतिक रुकावटों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

क्या होता है GLOF?

जब ग्लेशियर के पास बनी झील को रोकने वाली प्राकृतिक चट्टान, बर्फ या तलछट की संरचना टूट जाती है और झील का पानी अचानक बड़ी मात्रा में नीचे की ओर बहता है, तो इसे Glacial Lake Outburst Flood यानी GLOF कहा जाता है। पहाड़ी इलाकों में ऐसी बाढ़ बेहद कम समय में लंबी दूरी तय कर सकती है। इसलिए ग्लेशियल झीलों में हो रहे बदलावों पर नजर रखना जरूरी है।

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Early Warning System को मजबूत करना जरूरी

वैज्ञानिकों ने केदारताल जैसी झीलों की लगातार निगरानी पर जोर दिया है। नियमित सैटेलाइट निगरानी, जमीन पर निरीक्षण और आधुनिक तकनीक के जरिए झील के आकार और पानी की स्थिति में होने वाले बदलावों को समय रहते समझा जा सकता है। इसके साथ ही Early Warning System को मजबूत करना भी जरूरी है।

समय पर चेतावनी मिलने से संवेदनशील क्षेत्रों में रहने वाले लोगों और पर्यटकों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने के लिए महत्वपूर्ण समय मिल सकता है। केदारताल पर हुए अध्ययन का उद्देश्य डर पैदा करना नहीं, बल्कि भविष्य के संभावित खतरे के लिए तैयारी बेहतर करना है। बदलते हिमालय में समय पर जानकारी, वैज्ञानिक निगरानी और मजबूत आपदा प्रबंधन व्यवस्था ही जान-माल के नुकसान को कम करने में सबसे अहम भूमिका निभा सकती है।

Disclaimer :- यह लेख उपलब्ध वैज्ञानिक अध्ययन और दी गई जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। इसमें बताई गई बाढ़ की स्थिति कंप्यूटर सिमुलेशन पर आधारित एक संभावित सबसे खराब परिदृश्य है, न कि भविष्य में होने वाली किसी घटना की निश्चित भविष्यवाणी। केदारताल झील से GLOF आने की संभावना और उसका वास्तविक प्रभाव मौसम, ग्लेशियर की स्थिति, झील के जलस्तर तथा अन्य प्राकृतिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।

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