Visually Impaired Siblings Won Ustad Bismillah Khan Yuva Puraskar :- पौड़ी जिले के द्वारीखाल ब्लॉक स्थित कोटलमंडा गांव के निवासी निर्मल, मुकेश और अंजलि को संगीत नाटक अकादमी की ओर से प्रतिष्ठित उस्ताद बिस्मिलाखां युवा पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। यह सम्मान केवल तीन कलाकारों की उपलब्धि नहीं है, बल्कि उत्तराखंड की लोकसंस्कृति, लोकसंगीत और ग्रामीण प्रतिभाओं के लिए भी गौरव का विषय है। तीनों भाई-बहन जन्म से दृष्टिबाधित हैं, लेकिन उन्होंने अपनी इस चुनौती को कभी कमजोरी नहीं बनने दिया। संगीत के प्रति उनका समर्पण उन्हें आज देश के सबसे प्रतिष्ठित युवा सम्मान तक ले आया है।
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गरीबी और चुनौतियों के बीच शुरू हुआ संगीत का सफर
निर्मल, मुकेश और अंजलि के पिता उम्मेद सिंह और माता राजेश्वरी देवी गांव में मजदूरी कर परिवार का पालन-पोषण करते थे। परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं थी और पांच बच्चों में से तीन बच्चे जन्म से ही दृष्टिबाधित थे। निर्मल बताते हैं कि बचपन से ही उन्हें संगीत सुनने का बहुत शौक था।
जब रेडियो पर गढ़वाली गीत बजते थे तो वे उन धुनों को महसूस करते और घर में मौजूद खिड़की, दरवाजे, बोतल या किसी भी वस्तु पर ताल और सुर निकालने का प्रयास करते थे। धीरे-धीरे छोटे भाई मुकेश और बहन अंजलि की भी संगीत में रुचि बढ़ने लगी। घर का माहौल संगीत से भरने लगा और तीनों भाई-बहन आपस में संगीत से जुड़े खेल खेलते हुए अपनी प्रतिभा को निखारते रहे।
सुनकर सीखी पढ़ाई और संगीत की बारीकियां
दृष्टिबाधित होने के कारण उनकी शिक्षा सामान्य बच्चों की तरह पूरी नहीं हो सकी। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। सुनकर और समझकर उन्होंने हिंदी, अंग्रेजी और गणित का ज्ञान प्राप्त किया। स्कूल में जब वे गीत गाते थे तो शिक्षक उनका उत्साह बढ़ाते थे। शिक्षकों के प्रोत्साहन ने उनके आत्मविश्वास को मजबूत किया और यहीं से उन्हें यह महसूस हुआ कि संगीत केवल शौक नहीं बल्कि भविष्य भी बन सकता है।
संगीत बना जीवनयापन का सहारा
समय के साथ तीनों भाई-बहनों ने संगीत को अपने रोजगार का माध्यम बना लिया। निर्मल मुख्य गायक और संगीतकार की भूमिका निभाने लगे। अंजलि मंच पर प्रमुख कलाकार के रूप में पहचान बनाने लगीं, जबकि मुकेश ने हारमोनियम, तबला, ढोलक, गिटार और बांसुरी जैसे कई वाद्ययंत्रों में महारत हासिल कर ली। हालांकि यह सफर आसान नहीं था। शुरुआत में वे नि:शुल्क कार्यक्रम प्रस्तुत करते थे। जब उन्होंने मेहनताना लेना शुरू किया तो लोगों ने उन्हें बुलाना कम कर दिया। ऐसे कठिन समय में कई लोगों ने उनका साथ दिया और उनकी प्रतिभा को मंच दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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मिला सहयोग तो खुलने लगे सफलता के रास्ते
गढ़वाल सभा के तत्कालीन अध्यक्ष योगंबर सिंह रावत ने कोटद्वार में उनके कार्यक्रम आयोजित करवाए और उन्हें हारमोनियम भी भेंट किया। यह उनके करियर का महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। करीब बारह वर्ष पहले प्रसिद्ध संगीतकार राजेंद्र चौहान उनके घर पहुंचे और उनकी प्रतिभा को पहचानते हुए देहरादून के टाउन हॉल में बड़ा मंच उपलब्ध कराया। इसके बाद उन्होंने दिल्ली, मुंबई, गाजियाबाद समेत कई शहरों में कार्यक्रम करने के अवसर दिलाए।
उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने भी उन्हें सम्मानित किया। वहीं प्रसिद्ध हास्य कलाकार किशना बगोट ने भी उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। दिल्ली के गीतकार नरेंद्र पांथरी ने उनके मार्गदर्शक के रूप में महत्वपूर्ण योगदान दिया। राजेंद्र चौहान ने उनके गीतों की कैसेट भी रिलीज करवाई, जिससे उनकी पहचान और मजबूत हुई।
उत्तराखंड की युवा प्रतिभाओं के लिए बनी प्रेरणा
आज निर्मल, मुकेश और अंजलि की कहानी केवल एक पुरस्कार तक सीमित नहीं है। यह कहानी बताती है कि यदि मन में कुछ कर दिखाने का जज्बा हो तो परिस्थितियां और शारीरिक चुनौतियां भी रास्ता नहीं रोक सकतीं। कोटलमंडा गांव के इन तीनों भाई-बहनों ने यह साबित कर दिया है कि प्रतिभा किसी सीमा की मोहताज नहीं होती। उनका संघर्ष, समर्पण और सफलता आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
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उस्ताद बिस्मिलाखां युवा पुरस्कार से सम्मानित होने जा रहे निर्मल, मुकेश और अंजलि ने अपने जीवन से यह संदेश दिया है कि हौसले मजबूत हों तो मुश्किल से मुश्किल परिस्थितियां भी सफलता का रास्ता नहीं रोक सकतीं। उत्तराखंड की यह गौरवशाली कहानी देशभर के युवाओं को अपने सपनों के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा देती रहेगी।
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